शीतकालीन समय में भी कर सकते हैं बद्री विशाल के दर्शन
घुमक्कड़ी धीरज मिश्र
भाग एक
अभी मैनें उत्तराखंड सरकार द्वारा शीतकाल में पर्यटन के लिए जारी एक एड देखा जिसमें उन्होंने अपने यहां स्थित चारधाम ( उत्तराखंड के चार धाम) के कपाट बंद होने के बाद वहाँ के देवताओं के शीतकालीन पूजा स्थलों की जानकारी दी थी जिसमें उन्होंने श्री बद्रीविशाल के शीतकालीन प्रवास नरसिंह मन्दिर की भी चर्चा की है तो मुझे, यहाँ की सपरिवार की गयी यात्रा की स्मृतियाँ ताजी हो गईं। जैसा कि हम सबको पता है कि श्री आदि शंकराचार्य जी ने सनातन के उन्नयन के लिए भारत में चारो दिशाओं में धामों(पीठ) की स्थापना की जैसे-
1-उत्तर में बद्रीनाथ भगवान श्री बद्रीविशाल(ज्योतिर्मठ)
2-दक्षिण में रामेश्वरम- शंकर जी (शृंगेरी मठ)
3-पूर्व में जगन्नाथ पुरी- जगन्नाथ जी(गोवर्धन मठ)
3- पश्चिम में द्वारका- श्रीकृष्ण(शारदा मठ)
पिछली गर्मियों में उत्तराखंड में स्थित श्री बद्रीनाथधाम जाने के दौरान हम सभी रास्ते में स्थित जोशीमठ पहुँचे। समाचारों में जोशीमठ अपने धँसने की खबरों से काफी सुर्खियों में रहता है और हरिद्वार से बद्रीनाथधाम की यात्रा मार्ग का मुख्य पड़ाव स्थल भी है। इसी जोशीमठ में ज्योतिर्मठ/ज्योतिर्पीठ स्थित है और यहीं है श्री नरसिंह मन्दिर... जहाँ बद्रीनाथ धाम के गर्भगृह के मुख्य देवता बद्रीविशाल जी की उत्सव मूर्ति को प्रत्येक वर्ष शीतकाल में कपाट बंद होने के बाद बद्रीनाथ मंदिर से उतारकर जोशीमठ के श्री नृसिंह (नरसिंह) मंदिर में स्थानांतरित किया जाता है। जहाँ रावल व पुजारी अगले 6 महीने तक उनकी दैनिक पूजन व आरती करते हैं। यहाँ आप जाड़ों में भी उनके दर्शन कर सकते हैं।
हम यहाँ जून के महीने में पहुँचे थे तो सुहावना मौसम था। नृसिंह मन्दिर का पुनर्निर्माण बड़े ही सुन्दर ढंग से किया गया है ।चारो तरफ पहाडों से घिरा यह स्थान बड़ा ही शान्त व सुरम्य जगह पर है। जोशीमठ बस स्टैंड से थोड़ी ही दूर स्थित इस मन्दिर में जोशीमठ बायपास बन जाने के कारण सभी यात्री नहीं आते इसलिए भीड़ कम रहती है।मन्दिर में भगवान वासुदेव की की 8फीट ऊंची 24 अवतारों वाली गन्धार शैली में निर्मित प्रतिमा स्थापित हैं । यहाँ मुझे अतिप्राचीन ज्योतिर्मठ के अवशेष भी दिखे और यहाँ आपको बद्रीनाथ धाम के मुख्य पुजारी जी की (रावल) की गद्दी भी दिखेगी।मन्दिर में दर्शन पूजन व फोटो आदि लेने के बाद हम स्थानीय बाजार में थोड़ा घूमे और फिर बद्रीनाथधाम के लिए चल पड़े।



