अयोध्या में एक दिन-
पंडित धीरज मिश्रा
सियाराम मय सब जग जानी...
अर्थात पूरे संसार में राम का वास है ... पर उनको देख पाने के लिए जो दृष्टि चाहिए वह हम जैसे तुच्छ मनुष्यों में कहाँ? अतः हम मानवों ने इसके लिए मन्दिर बनाए जिससे हम अपने इष्ट के दर्शन कर सकें।इसी भाव से हमारे दोस्तों ने भारतीय संस्कृति के आधार पुरूष श्री रामचन्द्र जी की जन्मभूमि व उनके पुनर्निर्मित हो रहे मन्दिर के दर्शन की इच्छा लिए अयोध्या चलने की योजना बनाई। मित्र अवनीश,अमृत व ज्ञानप्रकाश के साथ हम सभी जब ट्रेन से अयोध्या रेलवे स्टेशन पहुँचे तो भोर हो चुकी थी। रेलवे स्टेशन के बाहर आटो वाले नया घाट के लिए सवारी भर रहे थे तो हम भी "नया घाट" सरयू तट पर पहुँच गए।एक चौकाने वाली बात यह है कि फैजाबाद से अयोध्या के बीच ही इस नदी को सरयू कहते हैं वैसे इसका नाम घाघरा है जो बलिया व छपरा के बीच गंगा नदी में मिल जाती है। सरयू नदी में ही भगवान राम विलीन हुए थे वह जगह गुप्तार घाट के नाम से जानी जाती है जो अयोध्या फैजाबाद मार्ग पर स्थित है।
नया घाट बहुत सुन्दर व सुविधाजनक है इसी घाट के एक छोर से एक नहर निकाली गयी है जिसे राम की पैड़ी कहा जाता हैं यहाँ एक बड़ी खुली जगह है यहीं पर देव दीपावली को लाखों दीपक जलाए जाते हैं एक तरह से यह अयोध्या का मुख्य आयोजन स्थल है। पास ही रामकथा व लीला के लिए आधुनिक निर्माण भी है। सरयू स्नान व पूजन के बाद हम राम की पैड़ी चले गए । इस नहर के किनारे बहुतेरे प्रचीन मन्दिर हैं जिनका जीर्णोद्धार किया जा रहा है इसी में एक नागेश्वर नाथ का प्रसिद्ध मन्दिर है। पैड़ी के दूसरे छोर से मुख्य शहर में वापस जाने के लिए आटो मिलते हैं। अयोध्या के मुख्य स्थान जैसे हनुमान गढ़ी, कनक भवन, दशरथ भवन, मणिदास की छावनी, राम जन्मभूमि परिसर आदि सभी जगहें अयोध्या जंक्शन से 2-4 किमी की परिधि में ही है। अपने रूकने की निर्धारित जगह पहुँच कर जोकि मित्र ज्ञानप्रकाश के नजदीकी रिश्तेदार की व्यवस्था थी हमने विश्राम किया। चारों तरफ़ पुलिस के जवान तैनात थे क्योंकि हम राम जन्मभूमि मन्दिर परिसर के एकदम निकट थे। यहाँ आप अपनी गाड़ी से नही आ सकते। स्थानीय लोग भी एक दो दिन पहले सूचित करके ही गाड़ी आदि मँगा सकते हैं।
यहाँ एक प्रथा है कि राम मंदिर जाने से पहले हनुमान जी के दर्शन करने चाहिए तो थोड़ा आराम करने के बाद हम हनुमान गढ़ी के बजरंगबली के दर्शन को चल दिए।हनुमान गढ़ी में हनुमान जी का 10वीं शताब्दी का बना मंदिर है जो उत्तर भारत में हनुमान जी के सबसे लोकप्रिय मंदिर परिसरों में से एक हैं। ।मुख्य मंदिर में, पवनसुत माता अंजनी की गोद में बैठे हुए हैं। कथा है कि रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे, तो हनुमानजी यहां रहने लगे। इसीलिए इसका नाम हनुमानगढ़ या हनुमान कोट रखा गया। यहीं से हनुमानजी रामकोट की रक्षा करते थे।मन्दिर के प्रवेश द्वार के आस-पास लड्डू व पेड़े की बहुत सी दूकाने जहाँ काफी स्वादिष्ट प्रसाद मिलता है मुख्य रास्ते की दूकानों के रेट ज्यादा लगे ... थोड़ा हटकर लगी दुकानों के रेट सामान्य हैं।सुबह सुबह पहुँचने से हमें हर जगह कम भीड़ मिल रही थी तो हमने अच्छे से दर्शन कर लिए।
अब हमने राम जन्मभूमि मन्दिर परिसर जाना तय किया क्यों कि हमने सुना था कि यहाँ 11बजे से 2 बजे तक दर्शन बन्द रहता है। इसके लिए कड़ी जाँच(पेन,पर्स,मोबाइल,दवा,प्रसाद कुछ भी नही होना चाहिए) के बाद आप जब आगे बढ़ते हैं तो लगभग 10 मीटर के व्यू गैलरी से आप रामचन्द्र जी के मन्दिर के निर्माण कार्य को देख सकते हैं जो अभी नींव स्तर पर है... जिस जगह गर्भगृह में भगवान का विग्रह होगा वहाँ एक झण्डा लगा है। वहाँ से आगे बढ़ने पर आप इस समय रामलला के पूजन के लिए बनाए गए लकड़ी के मन्दिर के सामने पहुँच जाते हैं जहाँ रामलला अर्थात भगवान राम बालरूप में एक हाथ में लड्डू लिए विराजमान हैं। उनके दिव्य दर्शन के बाद आप परिक्रमा करते हुए वापस वहीं पहुँच जाते हैं जहाँ से प्रारम्भ किया था ... अब यहाँ भीड़ काफी बढ़ चुकी थी।
यहाँ से हम कनक भवन के लिए चल दिए इस भवन के बारे में कथा प्रचलित है कि कनक भवन राम विवाह के पश्चात माता कैकई के द्वारा सीता जी को मुंह दिखाई में दिया गया था। जिसे भगवान राम तथा सीता जी ने अपना निजी भवन बना लिया। उस समय का यह भवन चौदह कोस में फैली अयोध्या नगरी में स्थित सबसे दिव्य तथा भव्य महल था। समय बीतने पर यह भवन नष्ट हो गया, लेकिन शास्त्रों और प्राचीन धार्मिक इतिहास के आधार पर इसी स्थान को कनक भवन महल माना गया। वर्तमान के कनक भवन का निर्माण ओरछा राज्य के राजा सवाई महेन्द्र प्रताप सिंह की पत्नी महारानी वृषभानु कुंवरि की देखरेख में कराया गया था। सन 1891 ई. को उनके द्वारा प्राचीन मूर्तियों की पुन:स्थापना के साथ ही राम सीता की दो नये विग्रहों की भी प्राण प्रतिष्ठा करवाई गई।
अयोध्या के इन सभी जगहों पर जाने के रास्ते सुन्दर व साफ सुथरे हैं। बिजली के तारों को भूमिगत कर दिया गया है और रास्तों पर फिनिशिंग के साथ पत्थर लगाए गए हैं जिससे पैदल चलना अच्छा लगता है। अब तक दोपहर हो चुकी थी धूप तेज लग रही थी तो हमने भोजन करके आराम करना तय किया। दोपहर बाद हम राम जन्मभूमि मन्दिर कार्यशाला गए ..पूरे अयोध्या में ऐसी कई कार्यशालाएँ जहाँ राममन्दिर के निर्माण के लिए पत्थर तराशे जा रहे हैं।यहाँ बड़े बड़े पत्थरों पर नक्काशी की जा रही है सभी पत्थरों पर क्रम संख्या लिखी हुई है जिससे उन्हें यथा स्थान लगाया जा सके। शाम को हम सब फिर से नया घाट सरयू जी के तट पर पहुँच गए। अयोध्या में शाम बिताने के लिए राम की पैड़ी अच्छी जगह है। बन्दरों से बचते हुए भुने भुट्टे खाने की चुनौती भी हमने पूरी की। यहाँ आप 50 रू की दर से सरयू में बोटिंग का भी आनंद ले सकते हैं। सरयू तट पर होनी वाली आरती के लिए काफी संख्या में भीड़ होती है तो हमने भी आरती के लिए भी सीढियों पर जगह ले ली ...मौका देखकर मैंने व अवनीश जी ने फिर से सरयू में डुबकी लगा लिया और अगले एक घन्टे हम भव्य आरती के साक्षी बने।अब हम वापसी की मुद्रा में आ चुके थे ...चूँकि ट्रेन देर रात में थी तो हमने अपने विश्राम स्थल पर पहुँच कर आराम करने का सोचा।
जब आप अयोध्या में घूमते हैं तो आपको इसके प्राचीन नगर होने का एहसास हो जाएगा। न जाने कितनी बार उजड़ कर फिर बनी है यह नगरी... पर फिर भी आपको अपने राम का बोध कराने में सफल रहती है।बचपन से रामायण सुनते बड़े हुए हम सभी लोगों को उस कथानक के सूत्र अयोध्या में दिखाई पड़ जाते हैं। आधुनिक विकास की दौड़ में सभी शहर एक से होते जा रहे हैं ... पर अयोध्या अभी बचा है और उसको बचाए रखने की जरूरत भी है और यदि आपके पास अधिक समय न हो तो भी 'अयोध्या में एक दिन' बिताकर आपको आनन्द मिलेगा यह तय है।



